रविवार, 20 मई 2018

मैं अकिंचन.....

मैं अकिंचन.....
मैं अकिंचन अक्षरहीन 
नयनन की भाषा लिखना
चाह विमर्श की होती है 
प्रियतम की गाथा लिखना 
सरल हृदय का भाषी हूँ ,
भाव सरल भाषा लिखना ... ।
भाव समन्वय की गतिशील रहे
अविरल प्रवाह गति मंथर मंथर
संवाद मौन की गगन दुंदुभि
नाविक प्रयाण पथ सदा निरंतर -
स्वर प्रकोष्ठ के नाद करें
जाग्रत अनंत जिज्ञाषा लिखना -
स्पर्श मलय का अभिनंदन
होने का प्रतिपादन कर दे
यत्र तत्र बिखरे शुभ परिमल
एक बांध सूत्र सम्पादन कर दे -
बाँच सके निर्मल मन मेरा
भाष्य नवल परिभाषा लिखना ......... ।
पुण्य प्रसून आरत यश भव की
स्नेहमयी आशा लिखना .....
सरल हृदय का भाषी हूँ ,
भाव सरल भाषा लिखना ... ।
उदयवीर सिंह

रविवार, 13 मई 2018

माँ पावन, माँ प्रज्ञा है

माँ पावन माँ प्रज्ञा है ... ...हर दिन माँ की दात..! ; कोटिशः प्रणाम 
' माँ की दुनियाँ संतान से आरंभ हो संतान पर खत्म होती है ' । 
***
ये बाग हरा,वरक सुनहरा न होता ,
तेरे आंचल की छांव,नेह का अमृत 
माँ अगर जीवन में भरा न होता -
उदय वीर सिंह

सरल हृदय का भाषी हूँ ......

मैं अकिंचन अक्षरहीन
नयनन की भाषा लिखना
चाह विमर्श की होती है
प्रियतम की गाथा लिखना
सरल हृदय का भाषी हूँ ,
भाव सरल भाषा लिखना ...
भाव समन्वय की गतिशील रहे
अविरल प्रवाह गति मंथर मंथर
संवाद मौन की गगन दुंदुभि
नाविक प्रयाण पथ सदा निरंतर -
स्वर प्रकोष्ठ के नाद करें
जाग्रत अनंत जिज्ञाषा लिखना -
स्पर्श मलय का अभिनंदन
होने का प्रतिपादन कर दे
यत्र तत्र बिखरे शुभ परिमल
एक बांध सूत्र सम्पादन कर दे -
बाँच सके निर्मल मन मेरा
भाष्य नवल परिभाषा लिखना .........
पुण्य प्रसून आरत यश भव की
स्नेहमयी आशा लिखना .....
सरल हृदय का भाषी हूँ ,
भाव सरल भाषा लिखना ...
उदयवीर सिंह




शुक्रवार, 11 मई 2018

फर्ज गुमनाम दिखते हैं

अधिकारों के झुरमुट बढ़ रहे
फर्ज गुमनाम दिखते हैं
षडयंत्रों की शाला झूठ बुलंद
हासिए पर वलिदान दिखते हैं -
खेतों से अन्न गायब हो रहे
शहरों में किसान दिखते हैं
मजलूम बेबस निरीहों में रावण
पाखंडियों में राम दिखते हैं -

उदय वीर सिंह

बुधवार, 2 मई 2018

पीर प्रेम परिहास बने ...!

पीर प्रेम परिहास बने ---- ! 
प्यासा मांगे पानी वीर 
मदिरा का गान सुनाते हो 
अस्मत का चीरहरण करके 
रेशम के वस्त्र कजाते हो -
वेदन की व्याख्या जिह्वा से 
मधुरस घोल बिलखते हो 
रिसते घावों का संज्ञान नहीं 
मरने पर मान दिखाते हो -
आँखों में आश खुशहाली की 
विश्वास हृदय में ले बैठा 
मरुधर में गंगा उपवन होंगे 
याचक को ज्ञान बताते हो -
घाव हथेली बहते बहुतेरे 
फिर भी हाथ नहीं रुकते 
दुर्दिन दुर्भिक्ष दैन्यता तेरी 
उसको प्रतिदान बताते हो
कर्म करो फल आशा कैसी 
मैं प्रतिछाया तेरी काया का 
अमावस की रात अंधरों में
तज दूर बहुत हो जाते हो -
करते गल संवेदन की 
वेदन का किंचित भान नहीं 
दया प्रेम करुणा की शाला 
नेह उद्यान लाते हो-
उदय वीर सिंह





रविवार, 29 अप्रैल 2018

एक सौदा मर्यादा का -------- ।

एक सौदा अब मर्यादा का भी --------  
हम भूल गए हैं ज़िम्मेदारी 
बात गई है ठेके पर 
शयन भूमि पर सौदा सच्चा 
खाट गई है ठेके पर -
खोदो कुआं राह मिलेगी 
बाट गई है ठेके पर -
हँसना भी ठेके पर हो 
रात गई है ठेके पर 
दूल्हा दुल्हन की खैर करो 
बारात गई है ठेके पर -
सूना चूल्हा खाली बटलोई 
परात गई है ठेके पर 
गौरव मर्यादा की बात पुरानी 
सौगात गई है ठेके पर -
कम पड़ते हैं कर आय अंश 
इमदाद गई है ठेके पर -
आँखों का पानी मरता
लाज गई है ठेके पर
 कैसे मंजिल जा दस्तक देंगे 
लात गई है ठेके पर -
अक्षम होते तंत्र हमारे 
अब बात गई है ठेके पर -
उदय वीर सिंह




रविवार, 22 अप्रैल 2018

.... कैसे कह दोगे !

.... कैसे कह दोगे ! 
किसी के हक को ईमदाद कह दोगे 
किसी फरियाद को विवाद कह दोगे
जख्म से रिसते खून जलते वर्तमान को 
उदयआखिर कैसे इतिहास कह दोगे-
माना की जरूरत है मनोरंजन की तुम्हें
किसी के दर्द को परिहास कह दोगे
चुप हैं दहशत से भरी आंखे जिनकी
अपने इकतरफा बयान को संवाद कह दोगे -
बस न पाईं उजड़ी बस्तियाँ आज भी
शैलाब में डूबा मंजर आबाद कह दोगे
फुलझड़ियाँ कामयाबी की दस्तावेज़ नहीं
टिमटिमाते दीप को आफताब कह दोगे -
उदय वीर सिंह

रविवार, 15 अप्रैल 2018

राजपथ में ध्वज नहीं सलीब कैसी है -

गुलामी में आजादी की दरकार थी
बाद आजादी के आजादी की चीख कैसी है -
हर शख्श अजनवी हर चौक में शोर
दाता और भिखारियों की लकीर कैसी है -
दरक चुके आईने की जमीन कह रही
अक्स में उभरी वतन की नसीब कैसी है -
बनती खाइयाँ देख सहम पूछता है देश
राजपथ में ध्वज नहीं सलीब कैसी है -
उदय वीर सिंह


सोमवार, 9 अप्रैल 2018

सामान नहीं है आबरू .....

सामान नहीं है आबरू तोलता क्यों है
नेह के शब्द जाने बोलता क्यों है -
अगर तूफान से लड़ने का जज्बा खोया
कदम बरसात में अपना रखता क्यों है -
शिकायत है फिज़ाओं से अगर तुमको
घर के दरवाजे बुहों को खोलता क्यों है -
जाना दर्द किसी मजबूर का अपना
रगों में खून का दरिया वीर बहता क्यों है -
उदय वीर सिंह


रविवार, 8 अप्रैल 2018

देख कर अवसर पाला बदल लेते हैं

देख कर अवसर पाला बदल लेते हैं 
थाली देखकर निवाला बदल लेते हैं
सत्ता की दौड़ भी क्या गुल खिलाती है 
बदल लेते हैं रब,शिवाला बदल लेते हैं -
बदल लेते हैं राह हमसफर ही नहीं 
शहर और नदी नाला बदल लेते हैं 
बह जाए खून की दरिया उनकी शान 
माजी कहता है मनके माला बदल लेते हैं -
वतन ईमान असूल फर्ज अलंकार हैं 
सिर्फ वतन परस्तों के लिए बने 
कायम रहे उनकी सल्तनत बुलंदी 

विश्वास ही नहीं बहनोई साला बदल लेते हैं -

उदय वीर सिंह