रविवार, 17 सितंबर 2017

परिंदों से खाली बगान रह गए हैं ।

परिंदों से खाली बगान रह गए हैं ।
 टूटे पंख खून के निशान रह गए हैं ।
 बिखरे सपने टूटे अरमान रह गए हैं ।
 बैग मेंकिताबें लिखने के सामान रह गए हैं ।
 भविष्य सँवारने के आलय थे अब
 कत्ल करने के स्थान बन गए हैं ।
तक्षशिला नालंदा में पढ़ने परदेशी आते थे
 हम अपने देश में मेहमान बन गए हैं ।
एक चीख से चीख निकल जाती थी
वो कितना चीखा होगा वक्ते कत्ल
समझा जिनको मंदिर शमशान हो गए हैं-
उदय वीर सिंह

शनिवार, 16 सितंबर 2017

वो हिन्दी बोलते हैं

घर हिन्दी बोलता है!
अक्षांश कार को पार्किंग में खड़ा कर ड्राईङ्ग रूम में सोफ़े पर विराजमान हुआ ।चेहरे के भाव असंयमित मन उद्विग्न था तभी उसकी माँ डिम्पल गौरांग ने कमरे में प्रवेश किया, और सामने आलीशान सोफ़े पर बैठ गई ।
क्या बात है इतने उखड़े उखड़े से लग रहे हो शैरी ? नौकर मंटो को पानी लाने का आदेश देते हुए अक्षांश की माँ ने बेटे अक्षांश से पूछा ?
कुछ नहीं माँ पुछो तो ही अच्छा है सबरीना के होने वाली ससुराल अगर गया भी तो मैं आप और डैड के कहने से ही गया वरना मैं तो उन लोगों के नाम व कर्म से ही अपना पूरा अनुमान जाने से पुर ही लगा लिया था । क्या खूब सोच लिया आप लोगों ने एक आधुनिक हाईली क्वालिफाइड आइकून की शादी के बारे में ... ऑ फ अक्षांश बोल गया
पहले ठंढा पानी पियो .... परेशान न हो
माम मैं दृष्टिरथ गौतम के घर गया उसके छोटे से घर के छोटे से बरामड़े में मुझे बैठाया गया घर में शायद जगह थी एक छोटी सी टेबल पर एक गांधी जी के चश्मे जैसा चश्मा जो एक धार्मिक किताब के ऊपर रखा हुआ था पास में एक बेंच देहाती किश्म की पड़ी मिली । कोने में एक बुजुर्ग एक सफ़ेद सी थैली में एक हाथ डाले मौन हो कुछ करते हुए मिले वो मुझे कोई रेस्पान्स न दे अपने काम में लगे रहे मुझे अच्छा नहीं लगा ।
वो माला जप रहे होंगे माम ने कहा
जो भी हो भीतर घर में से आवाजें रहीं थी दरवाजे पर एक पर्दा बेतरतीब लटक रहा था । बड़ी आसानी से घर की आवाज मैं सुन सकता था
माम आप यकीन करेंगी ?सब के सब हिन्दी /भोजपुरी में बातें कर रहे थे ! हाँ भोजपुरी में हिंदी में
घर के कुछ मेम्बर से मेरी मुलाक़ात हुई मुझे लगा मैं किसी और युग में आ गया हूँ जहा विकास का नामों निशान नहीं है । पता नहीं कैसे दृष्टिरथ उस परिवार से इंजीनियर बना ...मुझे हैरान करता है उसका भी संस्कार कमोबेस वही होगा ।
मैं अपनी बहन सबरीना के लिए ऐसा घर ऐसा घर का लड़का नहीं चुन सकता माँ ।आगे आप लोगों की मर्जी । मुझे न्यूयार्क से शादी मे नहीं आना । एक्सकुज मी माम ।
माइ सन ! डोन्ट वरी ।मैं भी नहीं चाहती ये रिश्ता ,तेरे डैड ने ज़ोर दिया तो तुम्हें भेजा पता नहीं उनको कैसे पसंद आया वो भी एक डाक्टर होकर क्या क्या अनाप शनाप सोच लेते हैं ... खैर जो भी हुआ भूल जाओ सबरीना को भी यह पसंद नहीं है
वी हैव टु सर्च अनदर डोर ...नॉट इन इंडिया अबराड़ आलसो ....
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उदय वीर सिंह .



मंगलवार, 12 सितंबर 2017

किस शिक्षालय पढ़ी है कोयल

किस शिक्षालय पढ़ी है कोयल
जब बोलेतो प्रीत निकलती है 
संग बारूद लिए बैठी दुनियाँ 
जब बोले तो चीख निकलती है 
दरिद्र हुआ जनमानस कितना 
भाई के हक में भाई से भीख निकलती है 
छोटा है पर पूर्ण जगत 
माँ बापू बोले तो आशीष निकलती है 
उदय वीर सिंह




बह रहा है रक्त सम्बन्धों से

बह रहा है रक्त सम्बन्धों से
कह सको तो सपना कह दो -
तय तिथि स्थान पर दी गई मौत
कह सको तो दुर्घटना कह दो -
संस्कृतयों का आचरण प्रलेख बनता है
कह सको तो कवि की रचना कह दो--
तेरे घर की नीलामी में शामिल है वो
कहसको तो उसे अपना कह दो -
लुटेरों को लुटेरा ही कहूँगा मैं
कहसको तो उन्हें महामना कह दो -
किसी साख पर कबूतर नहीं उगते
कह सको तो पेड़ की दुर्भावना कह दो -

उदय वीर सिंह

शनिवार, 9 सितंबर 2017

जो मौन है वो कौन है

जो मौन है वो कौन है
जो बोलता वो कौन है
हैं कुंन्द विचार ग्रंथियां
जो सोचता वो कौन है
घोर तिमिर मध्य में
चिंघाड़ना है दैन्यता
शांत चित्त बोध ले
पथ खोजता वो कौन है
छोड़ कर के युद्ध क्षेत्र
जो कभी गया नहीं
संकल्प करके बीच पथ से
लौटता वो कौन है
विनाश उत्सवों में है
प्रखर प्रलेख बन रहा
हृदय के तंतुओं को
तोड़ता वो कौन है -
करयोग्य हुई संवेदना
चुकाना हुआ हरहाल में
राष्ट्र प्रेम को भी धर्म से
तोलता वो कौन है
उदय वीर सिंह



रविवार, 3 सितंबर 2017

कुछ और नक्कारे चाहिए

अभी भीड़ कम है 
कुछ और नारे चाहिए 
शोर अभी कम है 
कुछ और नक्कारे चाहिए 
चार दीवारोंछट मुकम्मल है 
बांटने को कुछ और दीवारें चाहिए 
शिकार किसका है मत पूछ 
कुछ और हरकारे चाहिए 
ये सब जानते हैं तलवारों ने 
जुल्म किया है 
कुछ और तलवारें चाहिए -
सूखी हुई झील कितनी सुनी है
 हम ईसे आंसुओंसे भरेंगे 
कुछ और शिकारे चाहिए -
विरसती नहीं लगता है शहर 
कुछ और मीनारें चाहिए -
उदय वीर सिंह  


शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

समय के पाँव ने ...

समय के राग ने..
समय की छांव ने हँसाया भी बहुत है
समय की धूप ने जलाया भी बहुत है
समय के पाँव ने चलाया भी बहुत है
समय के घाव ने रुलाया भी बहुत है
समय की आँख ने दिखाया भी बहुत है
समय ने राज भी छुपाया बहुत है -
समय के राग ने गवाया भी बहुत है
समय के साज ने नचाया भी बहुत है
उदय वीर सिंह

शनिवार, 26 अगस्त 2017

सिर्फ गर्दन हमारी है -

मुशिफ भी तुम्हारा है वजीर भी तुम्हारा है
शमशीर भी तुम्हारी है सिर्फ गर्दन हमारी है -
खेल भी तुम्हारा है खिलाड़ी भी तुम्हारे हैं
पत्ते भी तुम्हारे हैं सिर्फ हार ही हमारी है -
मुल्क भी हमारा है ये मिट्टी भी हमारी है
अमन के सिपाही हैं ये किस्मत तुम्हारी है

उदय वीर सिंह       

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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

खाई गरीब घर रोटी गरीब जैसा हो गए


खाई गरीब घर रोटी गरीब जैसा हो गए
छिड़क लिया गंगा जल पहले जैसा हो गए -
देख गरीब को आँखों मेंआँसू बहे टूटकर
शर्मिंदा हुआ घड़ियाल जा मरा कही डूबकर
गरीब की बेटी के सिर रखाआशीष भरा हाथ 
होकर कलंकिनी मर गई ट्रेन के नीचे कूदकर -
गिरगिटों की तरह भेष बदलने का हुनर है
बहुरूपिये भी न जाते उनके डगर भूलकर -
अवतारी हैं देवों देवदूतों के हर मर्ज की दावा हैं
चमत्कार है सूखी नदी पार कर लेते हैं तैरकर -
नापसंद है हर चेहरा उनके चेहरे को छोड़कर
फिर भीओढ़ मुखौटा बदले भेष उनके जैसा हो गए

उदय वीर सिंह



मंगलवार, 15 अगस्त 2017

वतन आजाद है कुर्बानियों के बाद

ये सच है की गुलामी मिली बड़ी नादानियों के बाद 
वतन आजाद हुआ है बड़ी कुर्बानियों  के  बाद
सत्ता मद पक्षपात मोह में जब जब  डूबा सिंहासन 
सदियों बस न पाया ये चमन उजड़ जाने के बाद 
धर्म राजनीति के नक्कारों में टूटा समाज टूटी एका
वो आज भी मिल न पाए हैं बिछड़ जाने बाद -
शहीदी की राह कदम जाने के हैं वापसी के नहीं  मिलते 
वतन आबाद रहेगा उन निशानियों पर चलने  के बाद -

उदय वीर सिंह 

मासूम मौत

B RD मेडिकल कालेज गोरखपुर में असमय काल कवलित हुए नौनिहालों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि उनकी की आत्मा को ईश्वर शांति दे । रब परिजनों को असीम वेदना सहन करने की सामर्थ्य दे ।
हजहब जाति संप्रदाय क्षेत्र नहीं जीवन का नाश हुआ है राजनीतिक आंकड़ेबाजी नहीं आरोप प्रत्यारोप नहीं, व्यवस्था व समस्या के निदान की अनिवार्यता है । कुआं खोदकर पानी पीने की सलाह की जगह तत्काल जल की आवश्यकता है । सलाह देने वालों कभी पीड़ित परिवारों की जगह खड़ा होकर देखो बुझे चिराग, सुनी हुई गोंद॰ विलुप्त हुई किलकारी का दर्द क्या होता है ....शायद दर्द समझ में आ सके । नैतिकता अनैतिकता शायद राजनीति का विषय न हो परंतु स्वस्थ देश व समाज के लिए आवश्यक तत्व जरूर है जिसे हम कही खो रहे हैं ।
संवेदना मर गई तो त्राशदी ही हाथ आएगी
आज सत्ता की जंग है कल मौत मुस्कराएगी
उदय वीर सिह

शनिवार, 12 अगस्त 2017

मरना मेरे नसीब में जीना तेरे नसीब में है -

दोस्तों इसे किसी जाती जिंदगी या तंजीम से मत जोड़ देखना -
इसे ईत्तेफाक कहें या साजिश वीर
मरना मेरे नसीब में जीना तेरे नसीब में है -
ले इंसानियत की चादर अमन की बात करता हूँ 
मेरा नाम सबसे उपर सतरे रकीब में है
धो लेता हूँ घाव आंसुओ से सब्र से सील कर
इत्तेफाक है या साजिश मेरी गर्दन करीब में है
मैं बंधा हूँ कर्तव्य शपथ संस्कारों की गांठ
तूँ मुकर के भी ऊपर सतरे रफीक में है -
फाँकों में बसर होता है रखा अमीरों की सूची में
शाही जिंदगी का मालिक तूँ सतरे गरीब में है -
उदयवीर सिंह

सोमवार, 7 अगस्त 2017

8 अगस्त 1945 [ हिरोशिमा ]

8 अगस्त 1945 [ हिरोशिमा ]
मनुष्यता के समग्र विनाश का एक अक्षम्य कदम !
परमाणु बम विस्फोट हिरोशिमा में मारे गए लोगों को विनम्र श्रद्धांजलि पीड़ितों से अनन्य सहानुभूति ....
परमाणु बम का प्रथम नगरीय विस्फोट जिसमे मनुष्यता के खुले नरसंहार का विद्रुप प्रदर्शन था जिसमें मनुष्य मात्र नहीं मनुष्यता और संवेदना मरी।
उपनिवेशवाद व उसके प्रसार की अतिमहत्वाकांक्षा मनुष्यता से ऊपर होने का मद कारक बने । 
दुर्भाग्य है मनुष्यता देशों की तथाकथित सुरक्षा ग्रंथि से इतर हो गई है । मनुष्यता जहां मानव विध्वंस के हथियाओं की मुखालफत कर रही है ,वही देशों की लोलुपता अहंकार ग्रंथि ,तथाकथित श्रेष्ठता इसकी वकालत कर रही है ।
राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय बुद्धजीवी अवगत हैं इसके परिणामों से पर कदाचित असमर्थ हैं या उनकी मौन स्वीकृति यह रहस्य का विषय बन गया है ।
आवश्यकता है इन मानव विनाशक घातक हथियारों के निर्माण व प्रयोग पर पूर्णतया प्रतिबन्ध की । वरना जीवनविहीन हो जाएगी ये प्यारी धरती ।
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मिट गई मनुष्यता मनुष्य न रहेंगे
कब्रें तलाशेंगी हमदर्द कोई -
सोया मिलेगा हाथ धर चलने वाला
मुंतजिर न होगे खुले नैन कोई -
करने को सिजदा सिर न मिलेंगे
खंजर तो होंगे सिकंदर न कोई -
उदय वीर सिंह

रविवार, 6 अगस्त 2017

पनामा दस्तावेज़ रिसाव !

पढ़कर आश्चर्य ,विकलता द्वेष अद्द्भुत अविश्वसनीय अकल्पनीय नहीं लगा ।अब आदत सी हो गई है ,अब आशा प्रबल हो गई की हम आप से बेहतर कर सकते हैं - भले ही वह भ्रष्टाचार कदाचार व्यभिचार अत्याचार ही क्यों हो , आदर्शवादी नैतिकतावादी ब्रम्हचारी शाकाहारी अल्पाहारी सत्याचारी धर्म दिव्य संस्कारों के ध्वजवाहक, आदर्शों के पुरोधाओं का कत्थ्य क्या है कर्म क्या है
किस दलदल में है भारत का पुनरोत्थान कर्म .... आह पणामा ! वाह पणामा !
राजनीति, खेल, चित्र-पट, अर्थ, शिक्षा, व्यवसाय से प्रातः स्मरणीय स्वनामधन्य बुद्धजीविता,कमनीयता की वंशबेल -जड़ पनामा तक गहरी पसरी है । इसका पोषण कौन कर रहा है ? ये किसके लोग हैं कौन लोग हैं ? इनको छद्म आवरण कौन दे रहा है ? इनके पापों को प्रछन्न रूप से कौन धो रहा है ?
ज्वलंत गंभीर प्रश्न हैं .... आज भी अनुत्तरित हैं किसको सरोकार है इससे ? सरोकारी मौन हैं ।
धर्म जाति संगठन क्षेत्र प्रथम हुए देश गौड़ हो चला है शायद हम अवसरवादिता का पर्याय बनकर रहा गए है मूल्यों का जखीरा किताबों है मानवता के महाग्रंथ रोज रचे जाते हैं आदर्शों के मानदंड प्रतिमान इतने ऊंचे कि रीतिकालीन कवि महाकवि भूषण ,चन्द्रवरदाई भी छु पाएँ ....
आज हम गजलों में गीतों में मंचों प्रपंचों में वेदना तलाशते हैं
कित्रपट की सीता ,रंग-मंच का राम ,विदूषक की हंसी ,ब्र्म्हचारी का आचार चोले का रंग बेनामी संपत्ति का विमर्श अवसरनुकूल नहीं सम्यक रूप से दृश्य अदृश्य दोनों रूपों में आगणन वांछित क्यों नहीं होता ।
श्रद्धा आस्था भाव यथार्थ को वंचित करते हैं और हम इसके पोशाक हो गए सदा की तरह इसका भी विमर्श विलुप्त हो जाएगा परिभाषित कर दिया जाएगा ,एक नई परिभाषा दे
पानामा होते रहे हैं ..होते रहेगे हैं .... कभी गलती से अभेद्य- कवच कनक -कलश को कोई किट भेद देता है ,पनामा दस्तावेज़ का रिसाव हो जाता है और हम कुछ पढ़ लेते हैं ..... शायद यही हमारी नियति है

उदय वीर सिंह