शनिवार, 18 नवंबर 2017

हाथों में जब आई रबाब....

जहां जोति मुक्ति की आई ननकना कहते हैं 
हाथों में जब आई रबाब उसे मरदाना कहते हैं 
अपने खातिर जिया वह जिया तो क्या जिया 
जो जीते जी आजाद नहीं मर जाना कहते हैं -
बूंद बनी मोती जब ढल कर सागर बीच गई
बनकर मनके तीर आई तर जाना कहते हैं -
ज़ोर जबर जुल्मों की ताउम्र नहीं मनाई खैर
इक क्रांति की चिंगारी को सुलगाना कहते हैं -
उदय वीर सिंह

रविवार, 12 नवंबर 2017

सत्ता -मद दौलत ....
सत्ता-मद दौलत को क्या कहिए
माँ तात भ्रात के शीश कटे
बंटा हृदय ,घर ,आँगन, आँचल
प्रीत बंटी आशीष बंटे-
कहीं रुदन क्रंदन अवसाद विषम
छाती कूट रही सम्बन्धों की शाला
कहीं अट्टहास विभत्स विजय का
चढ़ घर द्वारे नवनीत बंटे-
कहीं ब्याहता तनया बहना
सत्ता चौपड़ की श्रीगार हुई
सात जन्मों की शपथ तिरोहित
संस्कार, सत्ता के द्वार लुटे -
दुर्दांत सत्ता के पैरोकारों
सत्ता शक्ति की चेरी है
हाथ आई पृथ्वीराज या जयचदों के
जब संस्कारों के बंध कटे -
खंजर छाती या पीठ घुसी धर्म सम्मत
कर विजयहाथ कहने वालों
व्रत संयम संकल्प अनुशासन छुट गए
खुशियाँ वापस होने में युग बीते -
उदयवीर सिंह


शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

देश न पूछ परिंदों का ....

मत पुछो तुम जाति हमारी बाना मेरा काफी है
मत पूछो तुम भाषा मेरी गाना मेरा काफी है -
मत पूछों बादल बयार की सरहद रोक सकोगे उनको
कहते रुक जाएंगे सांसें तेरी रुक जाना मेरा काफी है -
देश पूछ परिंदों का घर मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे
भाषा बोली राग व्याकरण चहचहाना उनका काफी है -
बेदर्दों की दुनियाँ होगी कोई अपना संग होगा
पूछो आँसू प्यार के रंग संग होना ही काफी है -
उदय वीर सिंह


जब मुंशिफ अंधा गूंगा बहरा हो
फरियाद बनकर क्या कारोगे -
रोशनी में चिराग बनकर क्या करोगे
आग की नदी आग बनकर क्या करोगे -
जमीन बंजर है बीज बांझ
फिर खाद बनकर क्या करोगे -
कान बंद कर लिए हैं सुनने वालों ने
संवाद बनकर क्या करोगे -
बंधे हों हाथ पैर मुंह आंखे कान
आजाद का खिताब लेकर क्या करोगे -
दिवालिया हो चुकी सल्तनत
खजाना खाली हिसाब लेकर क्या करोगे -
उदय वीर सिंह



शनिवार, 4 नवंबर 2017

तुम सदा कहती रहो -

तुम नदी हो प्यार की
निश्छल सदा बहती रहो -
मैं कथा सुनता रहूँ
तुम सदा कहती रहो -
मैं वरक पढ़ता रहूँ
तुम कलम लिखती रहो -
मकरंद मलय की गंध हो
मंथर मंथर चलती रहो -
तुम वीणा हो गीत हो
उर में सदा बजती रहो -
मैं सजाऊँ श्रींगार से
तुम सदा सजती रहो -
उदय वीर र्सिंह





शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

जो आप चाहेंगे ...

बादल वहीं बरसेंगे जहां आप चाहेंगे
तूफान ठहर जाएंगे जहां आप चाहेंगे -
निर्वात में जीवन की कल्पना कैसे
वीर हवा वहीं बहेगी जहां आप चाहेंगे --
अपराध अपराधी में फर्क रहेगा
सजा उसी को होगी जिसे आप चाहेंगे -
मुमताज़ शाहजहाँ रहें कहीं और
ताजमहल वहीं रहेगा जहां आप चाहेंगे -
फूल मुस्कराएंगे तो महक जायेगी हवा
महक वहीं होगी जहां आप चाहेंगे -
किसके सिने में दम है की रो भी ले
हँसेगा भी वही जिसे आप चाहेंगे -
जिसकी आँख उसकी नजर कैसे होगी
वही देख सकेगा जिसे आप चाहेंगे -
मांगने को हाथ बहुत हैं अधिकार
जिएगा वही जिसको आप चाहेंगे -

उदय वीर सिंह

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

पीड़ा मांग रही संवेदन

रोए कौन किसकी अर्थी पर
तन जिंदा मन मरे हुए
पीड़ा मांग रही संवेदन
जिंदा भी जीवन हार गए -
चौड़ी हुई विद्वेष की ड्योढ़ी
सँकरे मंदिर द्वार हुए
स्नेह सृजन शमशान गए
दस्यु लंबरदार हुए -
उलझ गए सुलझाने वाले
आँखों के आँसू सूख गए
घात प्रतिघात में कर उलझे
बंद प्रगति के द्वार हुए -
कौन जगाए जाग्रत को
निद्रा का ढोंग रचा सोया
सुलग रही है भूख की ज्वाला
कहीं शोक मंगलाचार हुए -
उदय वीर सिंह



शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

पुरुषार्थ होना चाहिए -

भक्ति का भावार्थ होना चाहिए
कर्म है वांछित निरंतर
निहितार्थ होना चाहिए -
विकल्पहीनता में युद्ध वांछित
सत्यार्थ होना चाहिए -
दंड भी स्वीकार्य अंतस
न्यायार्थ होना चाहिए -
रक्षित रहेगी अस्मिता
पुरुषार्थ होना चाहिए -

उदय वीर सिंह

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

दीये जलते हैं उजालों के लिए

दीये जलते हैं उजालों के लिए
बुझते हैं उजाला देकर
दीये जलते हैं प्रतीक्षा पथ में
बुझते हैं निवाला देकर -
दीये जलते हैं शाला समाधि पर भी
बुझते हैं साधक को शिवाला देकर -
दीये जलते हैं उत्सव और वेदन दोनों
बुझते हैं तूफान से मुक़ाबला लेकर
हम जलते हैं देख उंची पगड़ी
नुझते हैं विष का प्याला देकर -
उदय वीर सिंह




रविवार, 8 अक्तूबर 2017

पाँवों के निशान रास्ता देंगे

fमुझे दिल में ही रहने दो ताज बनाओ
देकर आंसूओ का मोहताज न बनाओ -
पीपल की छांव भी मुस्कराती है जींद
सल्तनत शाहजहाँ हसरत मुमताज़ बनाओ -
बेकस की बैसाखी बन जाऊ ख्शी होगी
मुझे जुल्मो सितम की आवाज बनाओ
मिलकर गले पोंछ लूँ आँसू कातर नयनों के
देकर दूरियाँ जमीन से आकाश बनाओ- -
आँखें देख लेती है आसमा को जमीन से
पाँवों के निशान रास्ता देंगे परवाज़ बनाओ

उदय वीर सिंह

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

आत्मा व वैद्य टूर गए बीमार रह गया

कितना वसूलते कर सुखी रगों से
आत्मा वैद्य टूर गए बीमार रह गया
खरीददार  रहे बाजार रह गया

चुकाने वाले  रहे उधार रह गया -
नामलेवा रहा घर परिवार में कोई
पर वसूली का पूरा अधिकार रह गया -
बंद हो गईं मिलें खाली मिल का मैदान
वो दिवालिया हो गईं समाचार रह गया
सिमट गए हाथ बिखर गए सपने
मालिक आबाद मुलाजिम बर्बाद रह गया

उदय वीर सिंह

रविवार, 24 सितंबर 2017

बेटी फरियादी नहीं हो सकती .....

वहसी लुटेरे जिस आँचल को फाड़ा
अपनी माँ से इजाजत अगर मांग लेते
कितने बे-खौफ हो कानून रब से
अपनी बहन बेटियों से ही डर मांग लेते -
नयन  हैं मुक़द्दस मगर नूर वाले नहीं 
नेत्रहीनों से ही नजर मांग लेते -
अंजान हो अपनी मंजिल से कितने
किसी हमसफर से डगर मांग लेते -
जलाने की पाए हो तालिम अपनी
आग सी धूप है एक शजर मांग लेते
लंका में सीता की आमद हुई है
राम भी आने वाले खबर जान लेते -
उदय वीर सिंह