रविवार, 2 जुलाई 2017

साधना समृद्ध हो गई है -

कागज पर लिख दी गंगा
कविता शुद्ध हो गई है -
कागज पर लिखा हिमालय
सरिता अवरुद्ध हो गई है -
कागज पर लिखा कठोर 
करुणा निशिद्ध हो गई है -
कोरी कल्पना के प्रतिमान मेरे ऊंचे हुए
चेतना प्रसिद्ध हो गई है -
कागज पर लिखी प्रतिष्ठा
साधना समृद्ध हो गई है -
लिखा G S T के बाबत तो
व्यवस्था क्रुद्ध हो गई है -
उदय वीर सिंह

4 टिप्‍पणियां:

Satish Saxena ने कहा…

बहुत खूब ,
हिन्दी ब्लॉगिंग में आपका लेखन अपने चिन्ह छोड़ने में कामयाब है , आप लिख रहे हैं क्योंकि आपके पास भावनाएं और मजबूत अभिव्यक्ति है , इस आत्म अभिव्यक्ति से जो संतुष्टि मिलेगी वह सैकड़ों तालियों से अधिक होगी !
मानते हैं न ?
मंगलकामनाएं आपको !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

vandana gupta ने कहा…

हमेशा की तरह लाजवाब

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस रचना को आपके नाम के साथ फेसबुक पर शेयर किया है .

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (03-07-2016) को "मिट गयी सारी तपन" (चर्चा अंक-2654) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'