सोमवार, 31 जुलाई 2017

मंदिर कभी मस्जिद ठहरता रहा -

मेरी शाम मेरी सुबह से जुदा रही
मंदिर कभी मस्जिद ठहरता रहा -
कभी तलाश न की साहिल की
मौजों के साथ बहता रहा -
मैंने पूछा नहीं कभी अमीरो फकीर से 
जो कहा दिल ने लिखता रहा -
मुख्तलिफ़ गुलों की कत्लगाह देखी है
मुस्कराने का ईनाम मिलता रहा -
बंधी हर कदम रश्मों में जिंदगी
जो मिली जितनी मिली जीता रहा -
उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (01-08-2017) को जयंती पर दी तुलसीदास को श्रद्धांजलि; चर्चामंच 2684 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'