रविवार, 6 अगस्त 2017

पनामा दस्तावेज़ रिसाव !

पढ़कर आश्चर्य ,विकलता द्वेष अद्द्भुत अविश्वसनीय अकल्पनीय नहीं लगा ।अब आदत सी हो गई है ,अब आशा प्रबल हो गई की हम आप से बेहतर कर सकते हैं - भले ही वह भ्रष्टाचार कदाचार व्यभिचार अत्याचार ही क्यों हो , आदर्शवादी नैतिकतावादी ब्रम्हचारी शाकाहारी अल्पाहारी सत्याचारी धर्म दिव्य संस्कारों के ध्वजवाहक, आदर्शों के पुरोधाओं का कत्थ्य क्या है कर्म क्या है
किस दलदल में है भारत का पुनरोत्थान कर्म .... आह पणामा ! वाह पणामा !
राजनीति, खेल, चित्र-पट, अर्थ, शिक्षा, व्यवसाय से प्रातः स्मरणीय स्वनामधन्य बुद्धजीविता,कमनीयता की वंशबेल -जड़ पनामा तक गहरी पसरी है । इसका पोषण कौन कर रहा है ? ये किसके लोग हैं कौन लोग हैं ? इनको छद्म आवरण कौन दे रहा है ? इनके पापों को प्रछन्न रूप से कौन धो रहा है ?
ज्वलंत गंभीर प्रश्न हैं .... आज भी अनुत्तरित हैं किसको सरोकार है इससे ? सरोकारी मौन हैं ।
धर्म जाति संगठन क्षेत्र प्रथम हुए देश गौड़ हो चला है शायद हम अवसरवादिता का पर्याय बनकर रहा गए है मूल्यों का जखीरा किताबों है मानवता के महाग्रंथ रोज रचे जाते हैं आदर्शों के मानदंड प्रतिमान इतने ऊंचे कि रीतिकालीन कवि महाकवि भूषण ,चन्द्रवरदाई भी छु पाएँ ....
आज हम गजलों में गीतों में मंचों प्रपंचों में वेदना तलाशते हैं
कित्रपट की सीता ,रंग-मंच का राम ,विदूषक की हंसी ,ब्र्म्हचारी का आचार चोले का रंग बेनामी संपत्ति का विमर्श अवसरनुकूल नहीं सम्यक रूप से दृश्य अदृश्य दोनों रूपों में आगणन वांछित क्यों नहीं होता ।
श्रद्धा आस्था भाव यथार्थ को वंचित करते हैं और हम इसके पोशाक हो गए सदा की तरह इसका भी विमर्श विलुप्त हो जाएगा परिभाषित कर दिया जाएगा ,एक नई परिभाषा दे
पानामा होते रहे हैं ..होते रहेगे हैं .... कभी गलती से अभेद्य- कवच कनक -कलश को कोई किट भेद देता है ,पनामा दस्तावेज़ का रिसाव हो जाता है और हम कुछ पढ़ लेते हैं ..... शायद यही हमारी नियति है

उदय वीर सिंह

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